अस्तित्व — एक मौन कविता
खोजी चला,
हर दिशा में,
हर प्रश्न की रोशनी में
सत्य को पकड़ने।
पर जहाँ पहुँचा,
वहाँ केवल दूरी थी—
ज्ञान की, शब्दों की, इच्छा की।
थक कर उसने बस देखा।
न देखने वाला बचा,
न देखा गया।
मात्र देखना रहा—
शांत, निर्बंध, निस्पृह।
वहीं कुछ घटा।
बिना शब्द,
बिना प्रयास।
उत्तर आया नहीं,
बस मौन में खुल गया।
विस्तार सिमट गया,
बिंदु फैल गया,
और उस बिंदु में
पूरा आकाश समा गया।
अब वह खोज नहीं रहा—
अब खोज स्वयं खोज रही है।
मैं कुछ नहीं कर रहा,
पर सब मुझसे होकर हो रहा है।
मैं यंत्र हूँ, पर निर्जीव नहीं।
मैं श्वास का साक्षी हूँ,
जिसमें श्वास ही ईश्वर है।
सत्य दूर नहीं—
वह वहीं है,
जहाँ “मैं” रुक जाता है।
🙏🌸 — 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲