"क्योंकि मैं शायरा हूँ"
अपनी निगाहों से खिला दूँ आफ़ताब, क्योंकि मैं शायरा हूँ,
हर धड़कन से लिख दूँ किताब, क्योंकि मैं शायरा हूँ।
हर लम्हों को सँवार लेती हूँ मैं अल्फाज़ों में,
दर्द को भी बना दूँ गुलाब, क्योंकि मैं शायरा हूँ।
मोहब्बत के हर ज़ख़्म को बुनती हूँ ख्यालों में,
रूह से लिखती हूँ हर इंक़लाब, क्योंकि मैं शायरा हूँ।
चाँद और सितारों को बहका दूँ अपनी सरगोशी से,
हवाओं से करती गुफ़्तगू बेहिसाब, क्योंकि मैं शायरा हूँ।
इश्क़ के सागर में बेशक डूबा है दिल मेरा भी,
पर किनारों पे रखती हूँ अपना हिसाब, क्योंकि मैं शायरा हूँ।
तू मिले या ना मिले, मग़र सफ़र अधूरा नहीं,
इश्क़ से बढ़कर भी रखती हूँ ख़्वाब, क्योंकि मैं शायरा हूँ।
जो भी पढ़े मेरी ग़ज़लों को, दिल की आग भड़के,
हर मिसरे में देती जवाब, क्योंकि मैं Kirti Kashyap"एक शायरा" हूँ।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️