बीता समय और आज का यथार्थ!
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समय का पहिया निरंतर घूमता रहा है, और इसके साथ ही समाज की तस्वीर भी बदलती रही है। एक समय था जब हमारे बुजुर्ग अपनी आयु के अंतिम पड़ाव तक स्वस्थ और निरोगी जीवन जीते थे। उनके शरीर में एक स्वाभाविक ऊर्जा थी, जो प्रकृति की शुद्धता से मिली थी। उस समय बीमारियों का आज जैसा विकराल रूप नहीं था, और अकाल मृत्यु की घटनाएँ भी विरले ही सुनाई पड़ती थीं। लेकिन आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि वह स्वस्थ समाज कहीं खो गया है।
आज की त्रासदी है,असमय मौतों का भयावह दौर!
आज चारों ओर एक भयावह सन्नाटा पसरा है, जो असमय मौतों की भयावह गूँज से भरा है। हमारे आसपास से कोई न कोई परिचित, कोई युवा या अधेड़ व्यक्ति अचानक चला जाता है। किसी का हृदय अचानक काम करना बंद कर देता है, तो कोई कैंसर, किडनी या लीवर की गंभीर बीमारियों से जूझते हुए असमय काल का ग्रास बन जाता है। इस भयावह चक्र को देखकर मन में अनगिनत सवाल उठते हैं। क्या यह केवल नियति का खेल है या फिर हमने अपने हाथों से ही अपने भविष्य की कब्र खोद ली है? यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि एक गहरी और दुखद सच्चाई है, जो हमारे जीवन की जड़ें हिला रही है।
विषैली होती धरती, और हमारा जीवन
आज की बीमारियों की जड़ में कहीं न कहीं हमारी धरती का ही दर्द छुपा है। हम अपनी धरती को माता कहते हैं, लेकिन उसे पोषित करने के बजाय हमने उसे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से पाट दिया है। अधिक उपज की लालसा ने हमें इतना अंधा बना दिया है कि हम भूल गए हैं कि जब धरती विषैली होगी, तो उस पर उगने वाला अन्न, फल और सब्जी कैसे शुद्ध हो सकते हैं? यह जहर हमारी थाली तक पहुँच चुका है, और धीरे-धीरे हमें अंदर से खोखला कर रहा है।
जब हम जहरीले अनाज, सब्जियों और दूषित पानी का सेवन करते हैं, तो हमारे शरीर के भीतर रोग अपनी जड़ें जमाना शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि आज हृदय रोग, कैंसर और गुर्दे से जुड़ी बीमारियाँ एक महामारी का रूप ले चुकी हैं। यह जहर सिर्फ खेतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने हमारी नदियों, तालाबों और भूजल को भी दूषित कर दिया है।
यह समय जागने का है। हमें इस मुद्दे को केवल एक सामाजिक विमर्श या चर्चा तक सीमित नहीं रखना चाहिए। यह हमारे जीवन से जुड़ा सबसे बड़ा प्रश्न है। आज जब हम एक प्रगतिशील समाज और राष्ट्र की बात करते हैं, तो हमें "प्रिवेंटिव हेल्थकेयर" यानी निवारक स्वास्थ्य सेवा को राजनीतिक एजेंडे और चुनावी घोषणापत्रों में सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन और समाज की स्थिरता का प्रश्न है।
किसी भी सरकार या राजनीतिक दल का यह प्राथमिक दायित्व होना चाहिए कि वह अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करे। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाना आवश्यक है:
जन-जागरूकता अभियान: लोगों को रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों और जैविक उत्पादों के लाभों के बारे में जागरूक करना।
जैविक खेती को बढ़ावा: सरकार को किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और इसके लिए सब्सिडी व अन्य सहायता देनी चाहिए।
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग पर सख्त कानून बनाना।
यह सुनिश्चित करना कि हर नागरिक को शुद्ध और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो, क्योंकि जलजनित रोग आज एक बड़ी समस्या बन गए हैं।
यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने नेताओं से इन प्रश्नों को बार-बार पूछें। यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है। जब तक हम अपने जीवन को इस जहर से मुक्त नहीं करेंगे, तब तक एक स्वस्थ और समृद्ध समाज की कल्पना अधूरी रहेगी।
आज जरूरत है एक ऐसे जन-आंदोलन की, जो इस भयावहता को समझे और हमारे नीति-निर्माताओं को जवाबदेह बनाए। हमें याद रखना चाहिए कि यह किसी और का नहीं, हमारे अपने जीवन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है।
आर के भोपाल।