बिहार में का बा??
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बिहार! यह नाम आते ही आँखों के सामने एक साथ कितनी ही परतें खुल जाती हैं—इतिहास का वैभव, ज्ञान की धारा, त्याग की गाथाएँ, और साथ ही विस्थापन की टीस। यही वह भूमि है जिसने दुनिया को पहला गणराज्य दिया, यही वह धरती है जहाँ से बुद्ध ने शांति का संदेश दिया, और यही वह प्रदेश है जिसकी मिट्टी में अब भी ज्ञान और परिश्रम की महक बसी है। लेकिन आज के समय में प्रश्न यही है—तो फिर क्या है बिहार का?
मज़दूर बिहार का है, पर कारख़ाना गुजरात का।
विद्यार्थी बिहार का है, पर कोचिंग की दुकान राजस्थान की।
मरीज़ बिहार का है, पर अस्पताल दिल्ली का।
दुल्हन बिहार की है, पर श्रृंगार महाराष्ट्र का।
यानी श्रम हमारा, पसीना हमारा, संघर्ष हमारा—पर लाभ किसी और का। जैसे बिहार अपने ही घर में पराया हो गया हो।
सच पूछिए तो बिहार आज एक विशाल एक्सपोर्ट हब है—पर यहाँ से निर्यात न मशीनें होती हैं, न वस्त्र, न फल-फूल; यहाँ से निर्यात होता है मानव संसाधन। खेत से खलिहान तक, रिक्शे से लेकर कारख़ाने तक, और अब तो सिलिकॉन वैली तक—बिहारी अपनी बुद्धि और श्रम की अमिट छाप छोड़ता है। मगर अफ़सोस, उसकी मेहनत का मूल्यांक किसी और की तिजोरी में दर्ज होता है।
सोचिए—
दूल्हा बिहार का, घोड़ी बिहार की, पर पहनावे का मान्यवर पंजाब का।
ड्राइवर बिहार का, पर ट्रक टाटा का और फ़ैक्ट्री झारखंड की।
पैर बिहारी का, पर जूता बंगाल का।
यह कैसा विडंबनापूर्ण दृश्य है! जैसे बिहार एक अथक साधक है, पर वाद्ययंत्र किसी और के हाथ में है। वह गीत गाता है, पर सुर किसी और का हो जाता है।
और फिर यही प्रश्न चुभता है—
तो क्या बचा है बिहार का?
न ढोल, न बोल, न रंग, न रस।
यहाँ तक कि अस्मिता भी बिखर कर परदेस की चौखट पर खड़ी हो जाती है।
पर ठहरिए! तस्वीर केवल इतनी उदास नहीं है। जो बिहार से निकला है, वही बिहार का भी है। मज़दूर जब मुम्बई में ईंट उठाता है, तो उसकी हड्डियों में गंगा का बल है। विद्यार्थी जब कोचिंग की बेंच पर बैठता है, तो उसकी आँखों में पटना के उजले सपनों की छाप है। और जब दुल्हन की माँग में सिंदूर भरता है, तो वह सिंदूर आज भी सोनपुर मेले की मिट्टी से निकली आस्था से जुड़ा है।
बिहार का मतलब केवल भौगोलिक सीमा नहीं है; बिहार एक जीवित चेतना है, जो जहाँ भी जाए, अपनेपन की स्याही छोड़ जाती है।
यहाँ का खेत चाहे सूखा हो जाए, पर यहाँ की कोख कभी बाँझ नहीं होती—न ज्ञान में, न श्रम में, न संकल्प में।
तो हाँ, सच है कि कारख़ाना गुजरात का है, कोचिंग राजस्थान की, और पार्लर महाराष्ट्र का। पर ईंट पर ईंट चढ़ाने वाली बाँहें बिहारी की हैं, और कलम से शब्द गढ़ने वाली उँगलियाँ भी बिहारी की।
बिहार का अर्थ है—श्रम, संघर्ष, साहस और संकल्प।
अब दृश्य बदलना चाहिए,
इस हिमखंड से अब कोई,
कोशी निकलना चाहिए।
श्रम, संघर्ष,साहस और संकल्प हमारा तो मालिक भी हमें ही होने चाहिए।
आर के भोपाल।