मिज़ाज नहीं ये मेरा मग़र फिर भी मजबूर हूँ मैं,
यही सबब है की अब क़ाफ़िलों से बहुत दूर हूँ मैं।
मेरे लहज़े से मुझको मगरूर समझते हैं लोग,
दर्द-ए-दिल कोई क्या जाने, ग़म-ए-सुरूर हूँ मैं।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️
सबब = कारण, वजह
क़ाफ़िलें = भीड़
मगरूर = घमंडी
ग़म-ए-सुरूर = ख़ुशी में छिपा हुआ दर्द