शिक्षक दिवस विशेष
शिक्षक होने के नाते सबसे बङा सामाजिक प्राणी होने का दम्भ,मैं भरता हूँ ।
पर डायनासोर की भांति विलुप्त ना हो जाए ये प्रजाति सोच के,मैं डरता हूँ ।
कभी जनगणना,कभी मतगणना,कभी पशुगणना ऐसी कितनी ही गणनाएं,मैं करता हूँ ।
कार्बन सा बहरूपिया बन कहीं हीरा,कहीं ग्रेफाइट तो कहीं कोयला बन,मैं फिरता हूँ ।
कभी हापू से,कभी धापू से,कभी धापू के बापू से, ऐसे कितनों से ही,मैं डरता हूँ ।
सोडियम सा क्रियाशील होकर भी,केरोसीन में डूब के,मैं मरता हूँ।
क्या कक्षा क्या कीचन, क्या कम्प्यूटर टेबिल क्या बिजली की केबिल, मैं मंडराता हूँ ।
कुरजां बन कभी खींचन में तो कभी साइबेरिया में, नज़र मैं आता हूँ ।
फिक्सेसन की,सस्पेंशन की,डीक्टेसन की,पेंसन की टेंशन लिए,मैं जीता हूँ ।
एनीमिया के रोगी सा,गिरता उठता रेबीज के लक्षण भी, मैं दिखलाता हूँ ।
राष्ट्र निर्माण का कर्म लिए, शासक,प्रशासक, रक्षक निर्मित,मैं करता हूँ ।
प्रेक्षपण यान बना निज जीवन को,नित नव उपग्रह प्रेक्षपित,मैं करता हूँ ।
इतना कुछ सहकर भी जग जीवन में सृजनात्मक ऊर्जा,मैं भरता हूँ ।
पर याद रहे शासन को,यूरेनियम सी विनाशक शक्ति भी,मैं रखता हूँ ।