चाँद तो रोज़ निकलता है..."
चाँद तो रोज़ निकलता है,
लेकिन... कुछ कहता नहीं।
मैं रोज़ उसे टकटकी लगाए देखती हूँ,
सोचती हूँ - शायद आज कुछ बोले।
पर वो भी... मेरी तरह चुप रहता है।
कभी लगता था कोई नहीं है मेरे साथ,
पर चाँद तो रोज़ साथ निभाता है।
मेरी तरह ही वो भी खुद को बादलों की गहराई में छुपा लेता है,
चुपचाप, बेआवाज़।
उसे कभी घमंड नहीं होता अपनी रोशनी पर,
ना कभी कहता कि “मैं सुंदर हूँ।”
बस चुपचाप अंधेरे को दूर करता रहता है।
चाँद तो रोज़ निकलता है...
लेकिन कहता कुछ नहीं
Neha kariyaal