साजिशों का शहर
साजिशों के इस शहर में, हर रोज़ क़त्ले-आम है,
इंसाफ़ के गलियारों में, फैला जुल्मो-साम है।
चेहरे सब मुस्कुराते हैं, दिल में रखते ज़हर हैं,
अंधेरों से भरे ये रस्ते, हर मोड़ पर खंजर हैं।
कौन दोस्त, कौन दुश्मन, अब ये समझ न आए,
जो कल तक साथ चलता था, आज पीछे वार कर जाए।
झूठ की मंडियों में, सच के सिक्के चलते नहीं,
जो बोले सच, वो बच पाए, ऐसी तक़दीरें मिलती नहीं।
हर गली में सौदे हो रहे, ईमान यहाँ गिरवी रखा,
मजबूरियों की बोली लगी, कोई बिक गया, कोई बिका।
रातें भी खामोश यहाँ, साया भी डरता दिखता है,
दीवारों के कान हैं लेकिन, इंसान ही बहरा दिखता है।
साजिशों के इस शहर में, हर कोई गुलाम है,
जो भी आँखे खोलेगा, वही सबसे नीलाम है।