बेतिरी देखली धोके में कुछ हकार के सिवा
असलियत सोदाई की तेरे बहार के सिवा
शरमाया दिल में, बस इतना समझ ले
तेरे बिन कुछ नहीं, मेरे बाजार के सिवा
बेसबब हुस्न जैसे आफ़ताब-ए-याख़रिद
तन्हाईया भी रोशन है इजहार के सिवा
तलाश की है जोश ए मिल्लत शायर मगर
सबर खोया कुछ नहीं, वो बेकरार के सिवा
रंग ए दिल ए करार मुस्तकील और नहीं रहा
मंज़िल नहीं रही, बेबस बेजुबा यार के सिवा“
हर सांस खाकसारी मंजर तुझी से जुड़ा है
अक्कास नज़ारे हैं सारे, इक इनकार के सिवा
“तू जो न था, तो इक साया भी संग न था
अश्क़ है मेरी ताकत, उस पुरसरार के सिवा
मस्त ओ बे खुद जब मैं आशिक़े माशूक़ बना
खुम ए जाम ए उल्फत तेरे इतबार के सिवा
रंग ए जादुई या मंजिल की सरगश्त है तू
रब से कोई दूरी नहीं, यार बेगार के सिवा
मौत भी फकत नजाकत नहीं, गर तू संग है
वजूद एजाज ए लब है, सार ही सार के सिवा
वस्क मूसा अगर फ़रिश्ता हूँ मैं, तेरी गुफ्तगू में
और न मांगा कभी कुछ, ख्याल दीदार के सिवा
इश्क़ जैसे दो-रुख़ी सिका है ए दोस्त अग्यार
रहबर कभी गिराता, इस या उस पार के सिवा
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जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर
मननं कुरु, चिन्तनं कुरु, कर्मभावं धारय the importance of reflection, contemplation, and maintaining the spirit of action (karma). - लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित - आदर सहित परिचय मैं जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर में रहता हूॅं लेखन का शौक है मुझे स्वास्थ्य,सामाजिक समरसता एंव सनातन उद्घट सात्विकता से वैचारिकी प्रकट से लगाव है, नियमित रूप से लिंक्डिंन,युटूयूब,मातृभारती, अमर उजाला में मेरे अल्फाज सहित विभिन्न डिजीटल मीडिया में जुगल किशोर शर्मा के नाम से लेखन कार्य प्रकाशित होकर निशुल्क उपलब्ध है समय निकाल कर पढें ।