रोशनी यकदा बस धुआ ए नूर ए असर हो गई
दिवाली में सजके ये रात मंजर ए कमर हो गई
रूखसत ए ख्वाब की उस को नजर हो गई,
गुल या गुलसिता सब्र ए आह मंजर हो गई।
आइना उन का जो हमी से ख्वाब ए बेंकरॉं,
वजूद ए हसरत जो इधर की उधर हो गई।
अब किस किस से कहे ये ख्वाब ए खामोशा
हसत ए उजाला कुछ यू ही बलातर हो गई।
उस के आलम का क्या ही सरमाया करूँ,
खाकसार ए दुनिया तुम्हारी नज़र हो गई।
मैं तो संग-ए-दर का मोहताज यु न था,
नक्स तके अहसास साया-ए-उदर हो गई।
अबतो फिराक ए फिक्र मानी यक़ीं आ गया,
हरऔ दिल ए आरजू मिरी मो’तबर हो गई।
राही ताबीर ए आह कुछ युतो कशिश देखो,
जिन्दगी नक्स ए राहत पल में सिफर हो गई।
सब कुछ अच्छा बेहतर कहूँ, किस को बुरा,
मगर सारी दुनिया ख्वाब ए अख्तर हो गई।
उजालो की रिवायां इस ओर सदा थी छुपी,
जुस्तजू ए शब या ख्वाब ए हसर हो गई।
हिज्र ए रात या हसीन असर देख लो,
हर घड़ी, हर नज़र में कबख़बर हो गई।
तसव्वुर ए तन्हाई दिल पे मोहब्बत के,
हिज्र ए रंगीन जब से तो बशर हो गई।
शहर-ए-ख़्वाबों में थी वो इक चाँदनी,
जिस की रौशनी खामोशी शजर हो गई।
शायद उस की आँखों में शब की हक़ीक़त थी,
रूकी कमबख्त सांसे अब शोर ए हुनर हो गई।
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जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर
दीपावली के शुभ अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं कृपया मनन करें चिंतन करें और कर्म का भाव रखें - लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित - आदर सहित परिचय मैं जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर में रहता हूॅं लेखन का शौक है मुझे स्वास्थ्य,सामाजिक समरसता एंव सनातन उद्घट सात्विकता से वैचारिकी प्रकट से लगाव है, नियमित रूप से लिंक्डिंन,युटूयूब,मातृभारती, अमर उजाला में मेरे अल्फाज सहित विभिन्न डिजीटल मीडिया में जुगल किशोर शर्मा के नाम से लेखन कार्य प्रकाशित होकर निशुल्क उपलब्ध है समय निकाल कर पढें ।