परवर्दा बार-बार क़यामत तु नकाबआरा है क्यूँ।
मफलूज ए ख़्वाब में भी अब गुलआरा है क्यूँ।
हुस्न-ए-बयां में नज़र आती है बोद ए ख्याली,
मुज्मर मिलने का कोई अब नहीं नूरआरा है क्यूँ।
दिल के गहराई में खामोश हैं जब्र ए मशीयतं,
हस्ती ए अफसार या रूह ए सुकू शम्सआरा है क्यूँ।
इश्क़ के सफर में था मंज़िल का कोई पता,
फिर भी तेरे नक्श-ए-क़दम ने जॉहआरा है क्यूँ।
वो दर्द-ए-जुदाई का नग़्मा जो दिल में बसता है,
हर आह में फिर भी एक क़सूर खुष्नआरा है क्यूँ।
सहर सहर बंदे मुसलसर गहराइयाँ हैं छुपी,
तुझसे मिलने की उम्मीद में अश्क जांनआरा हैं क्यूँ।
हवाओं में तेरे नाम का गलबाहे खसारा है क्यू,
पर तेरी ख़ामोशी हर इल्ज़ाम ए फलकआरा है क्यूँ।
लम्हों ने दस्तखत फितरतों ने उम्र को बांध लिया,
अब तो तेरा नाम भी ज़ख्म कोई अक्लआरा है क्यूँ।
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लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित - आदर सहित परिचय मैं जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर में रहता हूॅं लेखन का शौक है मुझे स्वास्थ्य,सामाजिक समरसता एंव सनातन उद्घट सात्विकता से वैचारिकी प्रकट से लगाव है, नियमित रूप से लिंक्डिंन,युटूयूब,मातृभारती, अमर उजाला में मेरे अल्फाज सहित विभिन्न डिजीटल मीडिया में जुगल किशोर शर्मा के नाम से लेखन कार्य प्रकाशित होकर निशुल्क उपलब्ध है समय निकाल कर पढें ।