मैं और मेरे अह्सास
फ़कीरा का कोई ठिकाना नहीं होता हैं l
फकीरी में आसमान के नीचे सोता हैं ll
खामोशी का चोला ओढ़कर भीतर से l
मस्ती में चैन और सुकून को बोता हैं ll
न खुशी की चाह न गम को रोना बस l
मस्त हो कभी हस्ता तो कभी रोता हैं ll
आवरदगी तो देखो अल्लड़ मौज में l
खुदा की आशिकी में दिन संजोता हैं ll
कोशिश-ए -आराइश -चमन महकाने l
लोगों के दिलों में सुख को पिरोता हैं ll
१९-९-२०२४
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह