चौपाई
*******
नित्य प्रभु को शीष झुकाओ,
खुद पर भी विश्वास दिखाओ।
सब कुछ ईश्वर के नाम करो,
फिर अपने सब काम करो।।
मंगल मंगल दिवस बनाओ,
हनुमत तनिक कृपा बरसाओ।
पूर्ण होय सब काम हमारे,
ध्यान धरो प्रभु राम दुलारे।।
जीवन की शुभ सुबह यही है।
जीवन की हर रीति वही है।।
समरस कब हर भाग्य दिखी है।
हार गये फिर जीत लिखी है।।
खुद पर जब विश्वास रखोगे।
सारी बाजी जीत सकोगे।।
जिसने अपना संयम खोया।
उसने अपनी किस्मत धोया।।
***********
माता
********
माता मुझ पर दया दिखाओ,
मुझको भी कुछ ज्ञान कराओ।
मेरी भी किस्मत चमका दो,
निज सुत का जीवन दमका दो।।
माता जीवन की है दाता,
बच्चों की वह भाग्य विधाता।
ध्यान मातु का जो भी रखते,
स्वाद मधुरता जीवन चखते।।
देर और अब करो न माता,
दर्शन देने आओ माता।
विनती इतनी सुन लो माता,
सोये भाग्य जगाओ माता।।
*****
होली - चौपाई
******
रंग अबीर गुलाल उड़ाओ,
मन के सारे मैल मिटाओ।।
निंदा नफ़रत दूर भगाओ,
होली का त्योहार मनाओ।।
रँग अबीर गुलाल उड़ाओ,
सब मिलकर ये पर्व मनाओ।
राग द्वैष को दूर भगाओ,
नहीं किसी को दु:ख पहुंचाओ।।
होली भी अब बदल गई है,
कल वाली अब पहल नहीं है।
भाईचारे का भाव नहीं है,
सौम्य सरल स्वभाव नहीं है ।
रंग अबीर गुलाल उड़ाओ,
होली का त्योहार मनाओ।
सबको अपने गले लगाओ,
सुंदर ये संसार बनाओ।
रंगों से सब खूब नहाते,
होली है सब ही चिल्लाते।
ध्यान सदा मर्यादा रखना,
गुझिया पापड़ मिलकर चखना।।
होली का त्योहार मनाओ,
नहीं नशे से प्यार जताओ।
रंग अबीर से खेलो होली,
रखकर मीठी मीठी बोली।।
प्रेम प्यार सद्भावी होली,
सबकी वाणी मीठी बोली।
भ्रष्टाचारी गुझिया खायें,
होली का आनंद उठायें।।
रंगों की रंगीली होली,
खाकर भंग खेलते होली।
इसकी होली उसकी होली,
भेद नहीं करती है होली।।
सबको सम लगती है होली,
सबको गले मिलाती होली।
रंग अबीर गुलाल उड़ाते,
जमकर गुझिया पापड़ खाते।।
*****
चुनाव
*******
बिगुल बजा, चुनाव है आया,
जनता का पावन दिन आया।
अपने मत की कीमत जानो,
अपनी ताकत भी पहचानो।।
झूठों का बाजार लग रहा,
खुल्लमखुल्ला झूठ बिक रहा।
ठगा जा रहा खुश भी वो है,
जो ठगता नाखुश वो ही है।।
फिर चुनाव का खेल शुरु है,
सभी पास बस हमीं गुरु हैं।
हार जीत में बहस चल रही,
जनता तो गुमराह हो रही।।
******
गणेश जी
******
गणपति बप्पा आप पधारो।
अपने भक्तों को अब तारों।।
शीष नवाए तुम्हें पुकारें।
भक्त तुम्हारे खड़े हैं द्वारे।।
नमन मेरा स्वीकार कीजिए,
मन का मैल निकाल दीजिए।
पहले अपना कर्म कीजिए,
फिर औरों को दोष दीजिए।
आज स्वयंभू दौर है आया ,
मेरे मन को बहुत रुलाया।
मर्यादाएं दम तोड़ रही हैं,
दौर नये पथ दौड़ रही हैं।
अपना अपना स्वार्थ हो रहा,
आपस में ही द्वंद्व हो रहा।
अब किस पर विश्वास करें हम,
खुद से ही जब डरे हुए हम।।
सुधीर श्रीवास्तव