सोचा न था
यादें इतनी मधुर हो सकती हैं,
शिशु की तरह सोयी
यौवन की तरह दौड़ती,
सभी पहाड़ों को इकट्ठा किये
झीलों से सटी
तलहटियों में धुंध सी जमी।
किसी को झांकती, खोजती
दरवाजों को खटखटाती,
खिड़कियां खोलती।
चिड़िया की तरह
मन में घोंसला बनातीं
फुर्र-फुर्र उड़ा करती हैं।
वे आसमान की तरफ जातीं
टिमटिमाते तारों के बीच
दुबकी हुई , सहमी सी
छेड़छाड़ के लिये खड़ी
परी बन चुकी हैं।
**महेश रौतेला
०१.०३.१६