विद्यालय को राजनीतिक अखाड़ा न बनाएँ।आजकल हर क्षेत्र की तरह विद्यालयों में भी भरपूर राजनीतिक वातावरण पनपता जा रहा है।शिक्षकों के परस्पर संबंध हो चाहे छात्रों की वरियता हो या उनके प्रवेश से संबंधित प्रक्रियाएं हो या उनके परीक्षा परिणाम हो।अब तक यही माना जाता था कि अध्यापन का अध्यवसाय निस्स्वार्थ एवं निष्कलुष होता है परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह अवधारणा गलत साबित हो रही है।विद्यालय में छात्रों के प्रवेश पाने के मापदण्ड क्या हैं ?छात्र का मेधावी होना या न होना उसके परिवार का आर्थिक एवं सामाजिक स्तर या किसी प्रतिष्ठित या उच्च पदाधिकारी की अनुशंसा (सिफारिश )।उपरोक्त तथ्यों में एक भी मापदण्ड के लिए आवश्यक है ही नहीं ।बालक शिक्षार्थी है और उसे विद्यालय में प्रवेश मिलना चाहिए । प्रवेश परीक्षा का उद्देश्य होता है छात्रों की झिझक को दूर करना ना कि उसकी योग्यताओं का परीक्षण करना । अगर छात्र मेधावी है तो बहुत अच्छा अवसर है शिक्षक के लिए कि एक प्रतिभाशाली छात्र के बौद्धिक स्तर तक जाकर पढा़ने का अवसर प्राप्त होगा।यदि छात्र विद्यालय प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र को हल नहीं कर सकता तो इसका मतलब यह नहींहै है कि वो विद्यालय में प्रवेश पाने के लिए निर्धारित मापदंडो को पूरा नहीं कर पा रहा तो उसे प्रवेश नहीं दिया जाएगा। अगर विद्यालय प्रबंधन समिति ऐसे छात्रों को प्रवेश नहीं देने के कानून को मानती हैं तो वे इस प्रश्न का उत्तर भी देने को तैयार हो कि उनके अनुसार कमतर बौद्धिकता के शिक्षार्थी कहाँ जाएँ ? विद्यालय में प्रवेश दिलाने अभिभावक इसलिए ही तो आते हैं कि उनका बच्चा योग्य एवं अनुभवी शिक्षक की छत्रच्छाया में उनके मार्गदर्शन में रहकर न सिर्फ विद्योर्पाजन करेगा बल्कि जीवन मूल्यों को सीखेगा संस्कार ग्रहण कर देश का भावी कर्णधार बनेगा। ऐसे में सोचिए अगर शिक्षण संस्थान थोड़े कमजोर छात्रों को प्रवेश नहीं देते हैं तो वहाँ वे अयोग्य घोषित हो गए। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं को अशिक्षित घोषित कर दिया।आजकल अधिकांश विद्यालयों में यही होता है कि बस श्रेष्ठ या सर्वोत्तम को ही प्रवेश मिलता है।यही व्यवस्था हर जगह रहती है। विश्व विद्यालयों में भी यही व्यवस्था है। कट ओफ लिस्ट बनती है उसके आधार पर प्रवेश मिलता है। सोचने की ये बात है कि क्या इस प्रकार के नियमों से हम छात्रों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं कर रहे हैं? एक तरफ़ हम आरक्षण का विरोध करते हैं और दूसरी तरफ़ इस व्यवस्था से काम कर रहे हैं तो कैसे भावी पीढ़ी से