किस्सा-ए-मोहब्बत , बेहतरीन ना था…
माना की मै , हसीन ना था…
दिल मेरा था सच्चा…
पर तुजे उसपे , यकीन ना था…
तेरे दिल मे मोहब्बत का , वजूद ना था…
और मेरे पास बेगुनाही का , सबूत ना था…
वफा के सीवा मेरा कोइ , ऊसूल ना था…
मुजे तेरे सीवा और कोइ , कुबूल ना था…
तू मूजसे बीछडे , मुझे ये मंजूर ना था…
तुने मांगी जूदाई , मेरा ये कसूर ना था…
चंद घडीयों की बात थी…
प्यार तेरा बे-पनाह ना था…
दिल लगाना गलती थी मेरी…
ईसमे तेरा कोइ गुनाह ना था…
माना गलतीयो से मै भी , जूदा ना था…
पर तू खुदा नही तो मै भी , खूदा ना था..