नाज़ुकता
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कितने नाजुक हैं कुछ लोग जो,
सूरज की पहली किरण से ही जल जाते हैं,
एक हम हैं जो हर शाम चिरागों से जलते हैं,
मगर फिर भी नहीं जल पाते हैं।
जब भी जोड़ती है नाम मेरा, अपने नाम के साथ,
लोग हिकारत से मुंह फेर कर,
मेरा नाम सुनकर क्यों चले जाते हैं?
अब किसी और दुआ के लिये,
ये हाथ उठते ही नहीं,
मगर तेरी याद आते ही,
मेरे हाथ न जाने क्यों जुड़ जाते हैं?
चांदनी थी चार दिन की, रातें हैं उम्र भर की,
हम स्याहियों में डूबकर गुज़ारते हैं जिंदगी,
कितने पत्थर हैं वो, जो नज़ारे देखने भी नहीं आते हैं।
- शरोवन