आज भी गुलजार है तेरे मोहल्ले की वो गलियां ,जो कभी तुझे मेरे नाम से जानती थी ...
सुना है अब हर सौदा तू नफा नुकसान देख कर करतीं हैं,मेरे साथ तू ये सब कहां जानती थी....
तू तो चला गया उन रास्तों को नीरस बताकर, जहां हर पत्थर गुलाबो की खुशबू में खो गया...
जब तूने बेवफा करार दे ही दिया मुसाफिर को ,तो क्यों वो बेवकूफ उन रास्तों को अपना बताकर तेरी यादों में हमेशा के लिए वहां सो गया......