मुझमे मेरा कुछ नही विश्वास ,अविश्वास
आसक्ति , विरक्ति , अनुरक्ति |
क्रोध , घृणा ,ईर्ष्या कुछ भी नही |
कभी किसी को शिद्दत से स्वीकार किया ही
नही मैने | करुँ तो भी कैसे जाने किसमे स्थिति है
मेरी ? कौन हूँ मैं ? कहाँ स्थिर हूँ ? कहाँ से आई हूँ ?
कहाँ जाऊँगी ? यह आना और जाना हो इच्छा में
शामिल बेशक मगर ! स्थिर नही हूँ मै ? आखिर !
हूँ भी तो कैसे ? पता कहाँ है कि आई कहाँ से
और जाना कहाँ है | कुछ पल जुगनू के से चमके थे ,
जिसकी रोशनी मे आस जागी थी | जीवन की लगा
कि हूँ जीवित मैं | हाँ !
नब्ज न दिखी लगा एक रोज दिख जायेगी |
हृदयगति कहाँ से पा रहा है देख पाऊँगी , स्पन्दन
में कभी यह प्राण कहाँ से है | तभी छिप गया जुगनू
जीवन की उस आस को अदृश्य करके |