तुम मुझे मेरे अपराध की सजा दे सकते हो !
दोषो से ही मेरा निर्माण हुआ है |....
तुम सामने देहधर आओ तो मेरा संदेह से देखना
तुम्हे | कहाँ से लाँऊ वो निर्मलता जल की भाँती ,
तुम्हारा स्वरुप मुझे दिखा दे जो |..
अनगिनत शब्द लिखती रहती हूँ हृदय मे
मन की स्याही और भावना की कलम से ,
जिसे केवल तुमने पढ़ा और सुना होगा |.......