सदिया गुजर गयी , सिलवटे बदल गयी इक शहर था यहीं कही , अब निशानीयाँ रह गयी उंचे उंचे मकान बने झुग्गीयाँ बिखर गयी कुछ लोग थे जो चल बसे कुछ नये शहर चल दिये हॅर शाम को जो रोशन था बिजली का वो खंबा अब नही रहा जिसे कंधा टिका कर मै खिडकी जो तेरी तख्ता था वो पिछली गल्ली का कोना था जहाँ हम सब से छिपकर मिलते थे वहाँ से थोड़ी दूर ही वो लाल रंग का डिब्बा डाक का बुके दादा सा लगता था कॅई दिन कई महिने हमारे खत के इंतजार मे वो रहेता था थोडी दुर जो चल दिया तो हर मोड़ पे कुछ यादे थी . उसी मोड़ पर कही हम ने बचपन में सायकील गिराई थी माँ की डाँट , पापा की चप्पल से डरकर उसी सडक पर वो पहेली दौड़ थी क्या वो शर्त थी ? जिस में हमने बनिये की धोती खिंची किसी पर होली में रंग डाला , यही कही की वो फोटो थी यही कही वो छत थी जिस पर पतंग के पेच लढाये थे यही कही रामलीला में रामजी पधारे थे यही कही इरफान ने ईद की दावत दि यही कही नवरात्री मे हम नाचे थे यही कही गणपती मंडप में हम जागे थे वही समंदर है जिने जवानी का सैलाब दिया आँखो मे सपने भरे इरादो को तुफान किया सदिया गुज़र गयी , सिलवटे बदल गयी .इके शहर था यहीं कही बस अब निशानीयाँ रह गया