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sachit karmi

sachit karmi

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हिंदी, मेरा सच और नया सवेरा

हाँ, मैं हिंदी से मुख मोड़ता हूँ,
किसी और कारण नहीं, मैं खुद ही दोषी हूँ।
अपनी समझ और ज्ञान के बजाय,
दिखावे और 'अंग्रेजी' को महत्व देता हूँ।

अपनी विरासत पर गर्व करने के बजाय,
मैंने हीनता और डर को गले लगा लिया है।
इस अंधी दौड़ की आधुनिक दुनिया में,
मैं अपनी ही भाषा को बोझ समझ बैठा हूँ।

न अब हिंदी सीखने की कोई सच्ची रुचि बची है,
न ही इस स्थिति को बदलने की कोई आशा नज़र आती है।
क्या यही मेरी पहचान है? क्या यही मेरा सच है?

लेकिन एक उम्मीद अभी बाकी है, इस नई पीढ़ी में,
जो अभी भी अपनी जड़ों—भाषा-प्रेम—को गले लगा सकती है।
आओ मिलकर एक नया प्रण लेते हैं,
इस उदासीनता से ऊपर उठकर, हिंदी का गौरव लौटाते हैं।

आओ, नया सवेरा—हिंदी दिवस मनाते हैं!

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आँखों से आँसू
अब नहीं बहते—
शायद आँसू भी
थककर मर जाते हैं
लगातार रोते-रोते।

वक़्त की रेत
आँखों में इतनी भर गई है
कि अब कोई सपना
अंकुरित नहीं होता।

कभी इन आँखों में
किसी के लौट आने की
एक छोटी-सी उम्मीद थी,
अब वहाँ
उम्मीद की कब्र है।

सदियों से कोई
घर लौटा ही नहीं।

दरवाज़ा अब भी खुलता है
हर आहट पर,
लेकिन भीतर से
एक आवाज़ आती है—
“किसका इंतज़ार है?”

मैं चुप रहता हूँ।

क्योंकि सच यह है
कि जिसे लौटना था
वह शायद कभी गया ही नहीं था,
और जिसे मैं अपना समझता रहा,
वह मेरे भीतर
बहुत पहले मर चुका था।

अब घर में
सिर्फ़ दीवारें बची हैं,
दीवारों पर टँगी स्मृतियाँ,
और स्मृतियों के पीछे
एक आदमी—

जो रोज़
अपने ही भीतर से
थोड़ा-थोड़ा गायब हो रहा है।

शायद यही उम्र है—
जब आदमी मरता नहीं,
बस उसके भीतर
लौटने की इच्छा
मर जाती है।

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