कभी एक लौ सी चमचमाती है
जुगनू बन एक उम्मीद जगाती है
कभी अंधेरे में गुम सी हो जाती है
हर पल जाने कैसे कैसे मंज़र दिखाती है
ज़िंदगी भला कब समझ आती है
कभी गरम हवा और लू सी लगती है
कभी ठंडी शीतल बयार बन जाती है
कभी पतझड़ सी नीरस तो कभी
बसंत के नई कोपल सी खिल जाती है
ज़िंदगी भला कब समझ आती है
कभी गिरते हुए को हौसले से भर देती है
उठकर फिर चलने की हिम्मत देती है
कभी किसी को आसमान देती है
कभी झटके से फर्श पर गिरा जाती है
ज़िंदगी भला कब समझ आती है
एक अबूझ पहेली है और कुछ नहीं
ज़िंदगी सांसों की सहेली है और कुछ नहीं
हर नज़र की अपनी अलग परिभाषा है
ज़िंदगी से सबकी अपनी अलग ही आशा है
कुछ उम्मीदों को पूरा करती और
कुछ को अधूरा ही छोड़ गुज़र जाती है
ज़िंदगी भला कब समझ आती है
अनिता पाठक