ओ मुसाफ़िर
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अनजाने रस्तों पर चलकर खड़े हो गए ऐसे पल कुछ
जैसे भटका हुआ मुसाफ़िर अपनी मंज़िल खो देता है
सहमे हुए कदम ऐसे हैं जो बस थकने ही वाले हैं
धड़क उठा है दिल कुछ ऐसे जैसे साहिल भटक गया है ----
शायद कोई लहर किनारे ढूँढा करती रही उम्र भर
सपन सलोने खो जाते हैं या फिर अंबर धूल उढ़ा दे
जाल सजे हैं जाने क्यों ये ,सुनहरे सपनों से लगते
उमर टटोले गुदड़ियों में सपनों की टूटी सी किरचें
और भ्रमर की गुनगुन ने भी कुछ ऐसी पलटी है पारी
मन के आँगन की फुलवारी बिता उम्र मुरझाती सारी
मन का आँगन गाँव हो गया सारा जग विश्राम हो गया
सद्भावों की धूप भरी थी छाई क्यों परछाईं कारी
कुछ समझा दो मन को मेरे ,जाने क्यों उद्विग्न हुआ है
बार-बार समझाती खुद को फिर भी क्यों ये अड़ा हुआ है
बहक रहा है डग भर-भरकर सड़कों का सूनापन मुझमें
चिंता डोली चढ़ मन बैठी अंधियारों का पान हुआ है|
डॉ . प्रणव भारती