धर्म (दोहा - छंद)
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साथ धर्म के ही चले, अधर्म होना संग।
पथ से हम भटके नहीं, निश्चय हो ना भंग।।
धर्म राह पर जब चले, प्रभु आते हैं संग।
दया , धर्म औ सत्य ही, प्रभु के होते अंग।।
जब भी होती हानि धर्म की, बड़े है जब अधर्म।
तब जग में अवतार धर, आते पुरुषोत्तम।।
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित