रुठना मत कभी मुझसे !
मना न पाऊँगी ,
अक्सर छोड़ती गई हूँ सबकुछ ,
मेरी मुट्ठी मे जो न समाया ,
जुनूनी नही हूँ मै !
मुझे साधना नही आया |
हा! जो गया जाने का अधिक अफसोस भी न किया,
धीरे -धीरे जाना भी बोझ उतर जाने जैसा रहा ,
गये तुम तो तुम्हे बुला न पाऊँगी ,
मगर ! शायद तुम्हे कभी भुला न पाऊँगी ,
जीवन और मृत्यु के बीच एक दीवार हो तुम,
चलती साँसो की दरकार हो तुम ,
हृदयशून्यता के आभाष मे तुम्हे कैसे रिझा पाऊँगी,
मै शायद तुम्हे बुला न पाऊँगी |
खो जाऊँगी शायद किसी गहरे अंधकार मे ,
अपने अस्तित्व को न खोज पाऊँगी |
मत रूठना मुझसे तुम्हे मना न पाऊँगी ,
चिता के सम्मुख बैठी कुछ गिन चुनी साँसे ,
जिसमे स्पंदन तुम्हारा जीवन का अहसास कराता |
रोक लेना तुम सामने बढ़ते कदमों को मेरे,
चलते समय ! शायद आवज न दे पाऊँ ,
आ जाना मनाने की जिद न करना,
सूखे गले से तुम्हे बुला न पाऊँगी ,
आ जाना तुम ! तुम्हे मना न पाऊँगी |
19/04/2022