हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा !
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रमई काका उर्फ़ चंद्रभूषण त्रिवेदी की पुण्य तिथि पर अवधी में लिखी उनकी कविता
इन पंक्तियों का अर्थ आपको हँसने पर मजबूर कर देता है ..पढ़ें और अर्थ साझा करें।
[ १ ]
हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा |
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँ – कहूँ ध्वाखा होइगा —
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर |
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर ||
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला |
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा ||
[ २ ]
म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट , मुंह पौडर औ सिर केस बड़े |
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े , बाबू जी याकै रहैं खड़े ||
हम कहा मेम साहेब सलाम , उई बोले चुप बे डैमफूल |
‘मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ ‘ , हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा ||
[ ३ ]
हम गयन अमीनाबादै जब , कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा |
माटी कै सुघर महरिया असि , जहं खड़ी रहै दरवाजा मा ||
समझा दूकान कै यह मलकिन सो भाव ताव पूछै लागेन |
याकै बोले यह मूरति है , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा ||
[ ४ ]
धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ , मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी |
मुंहु पौडर पोते उजर – उजर , औ पहिरे सारी सुघर बड़ी ||
हम जाना मूरति माटी कै , सो सारी पर जब हाथ धरा |
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं , हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा ||
————— रमई काका (१९१५-१९८२)