जब भी कोई
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जब भी कोई इम्तिहान होता है ,
लाल क्यूँ आसमान होता है |
पोर हाथों के झनझनाते हैं
सर्द सारा जहान होता है |
दिल धड़कता है याद कर करके ,
जबकि साया जवान होता है |
उम्र बेंधती है लरज पैरों की ,
छूटता सा मुकाम होता है |
होश भी आँखों में चुप नहीं रहते ,
सामने टूटा मकान होता है |
प्रणव भारती
(सुभोर स्नेही मित्रों )