आपबीती/लघुकथा
माँ बहन या बेटी
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विगत दिनों आभासी दुनिया से जुड़ी मुंहबोली बहन की जिद पर पहली बार उसके निर्माणाधीन मकान पर जाना हुआ। जहां उसके चेहरे पर सचमुच की छोटी बहन जैसी खुशी देख मन गदगद हो गया। क्योंकि वह पहले ही बेटे और मजदूरों से इस बात की चर्चा कर चुकी थी कि बड़े भैया आ रहे हैं।
वापसी की बात पर और वो जिद कर घर चलने का अनुरोध करने लगी, मना करने पर उसकी आंखों में आसूं भर आये, शायद ये भी सोचती रही होगी कि उसका अपना भाई भी क्या यूं ही मना कर देता? उसकी भावुकता ने मुझे हिला दिया और उसकी भावनाओं को सम्मान देते हुए मैंने स्वीकृत क्या दिया, वो कितनी खुश हो गई,ये बता पाना मुश्किल है। लेकिन मुझे भी संतोष तो हुआ ही कि मेरे किसी कदम ने एक शख्स को खुश होने का अवसर तो दिया।
वहां से निकलते हुए ही काफी विलंब हो चुका था। विद्यालय और मकान की व्यस्तता के बीच उसके पास ढंग से सांस लेने तक की फुर्सत न थी। उसने बेटी को फोन पर मेरे भी आने की सूचना देकर मेरे मना करने की गुंजाइश भी समाप्त कर दी।
खैर! रात करीब 9.30 बजे बहन और उसके बेटे के साथ हम घर पहुंचे। उसके घर की अस्त व्यस्त हालत उसकी व्यस्तता की सारी कहानी बयां कर रहे थे।
फिर भी उसकी खुशी देख लगा कि उसे भाई के आगमन की खुशी ने कुछ न सोचने की हिदायत ने उसे सब कुछ भूल जाने की प्रेरणा दे दी थी।
मैंनें महसूस किया कि बहन भाई के रिश्तों में औपचारिकताओं के लिए जगह ही नहीं है।
बहन छोटी हो या बड़ी, उसके मन में भाइयों के लिए मातृत्व भाव उमड़ ही आता है। मुझे भी उसके व्यवहार में कुछ ऐसा ही भाव लगा।
सहसा यह विश्वास करना कठिन हो रहा था उसके स्नेह, दुलार, और अधिकार जताने के तरीके को मैं किस तरह परिभाषित करूं। मां की ममता या बहन बेटी के दुलार के रूप में।
हम चारों ने साथ साथ भोजन किया। दिन भर की थकान उसके चेहरे भर झलक रही थी। फिर भी निश्छल भाव से बातें करती रही। जैसे उसे भाई के फिर से बिछड़ जाने का डर हो रहा हो।शायद इसीलिए बड़े भाई के संरक्षण का बोध चाहती रही होगी।
चंद घंटों के साथ में मेरे मन में उसके लिए श्रद्धा के साथ उसके लिए अमिट दुलार का भाव पैदा हो गया।
आज भी हम इस भावानात्मक रिश्ते को निभाते आ रहे हैं। जिसमें खून के रिश्तों की सी मजबूती बनी हुई है।
साथ ही बड़ा होने के कारण मुझे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास भी।
आज भी अपनी हर छोटी बड़ी बातों, समस्याओं से वह मुझे अवगत कराती है।समय समय पर छोटी बहन की तरह जिद और गुस्सा भी दिखाकर अपने अधिकारों का प्रयोग करने में भी पीछे नहीं रहती।
कभी कभी ऐसा लगता है कि पूर्व जन्म का कोई रिश्ता फिर से जीवंत हो गया है। तब शायद वो मेरी मां रही होगी या मेरी बहन या बेटी।
सुधीर श्रीवास्तव