उसके नाम
------------
ज़िंदगी की उलझनों की एक शाम
उसके नाम
जो शब्दों से परे है
अर्थों से परे है ---
जो है एक हास
एक अटठ्हास
लक्ष्मण रेखा समाज की नहीं
मन की होती है जो
जागो तो जाग जाती है
सोओ तो सो जाती है ---
मान्यताएँ गढ़ने वाले मन
भटकते हैं और लटकते हैं
त्रिशंकु की भाँति
वह लटकता नहीं
दृढ़ विश्वास के पैरों पर बढ़ता है
आस्था की मीनार पर चढ़ता है
सहारा लेकर त्रिशूल की नोंक का
वह पुस्तक है खुली
बंद पन्ना बी
हमारे हज़ारों सलाम
हैं उनके नाम
जो बने हुए रास्तों पर
घिसटते नहीं ---
बनाते हैं अपने मार्ग स्वयं
जूझते हुए ---और ---
दे जाते हैं ,एक यादगार ---
वे एक स्मृति बन जाते हैं ------!!
डॉ. प्रणव भारती