आख़िर क्यों ?
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क्यों मचाते हैं हम दंगे
क्यों मचाते हैं शोर
क्यों लहू-लुहान करते हैं
अपनी आत्मा को
छोटी-छोटी बातों पर
अपने अहं का खोल
लेते हैं चढ़ा
सच तो यह है
हम स्वयं को ही
करते हैं पीड़ित
शीत युद्ध हो
अथवा देशों के युद्ध की विभीषिका
कल्याणकारी कोई नहीं
शुरुआत होती है सदा
अहं की टकराहट से
परिवर्तित हो जाती है
एक असहाय बेचारगी में
हम शून्य में
रह जाते हैं तकते----
डॉ. प्रणव भारती