संवत् १६१६ में कामदगिरि में सूरदासजी तुलसीदासजी से मिलने आए और अपना ग्रन्थ ‘सूरसागर’ उन्हें दिखाया और दो पद गाकर सुनाए । तुलसीदासजी ने सूरसागर को हृदय से लगा लिया । इसके बाद वे काशी में प्रह्लाद-घाट पर एक ब्राह्मण के घर पर रहने लगे । वहां उनकी कवित्व-शक्ति जाग्रत हुई और वह संस्कृत में रचना करने लगे । लेकिन आश्चर्य यह था कि दिन में वे जितनी रचना करते रात में सब-की-सब गायब हो जातीं । यह घटना रोज होती, तुलसीदासजी को समझ नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए ?
आठवें दिन तुलसीदासजी को स्वप्न में भगवान शंकर ने कहा कि तुम अपनी भाषा में काव्य-रचना करो । तुलसीदासजी उठकर बैठ गए । उनके हृदय में स्वप्न की आवाज गूंजने लगी । उसी समय भगवान शंकर और माता पार्वती दोनों ही उनके सामने प्रकट हुए और बोले—
‘तुम जाकर अयोध्या में रहो और वहीं अपनी मातृभाषा में काव्य-रचना करो, संस्कृत के पचड़े में मत पड़ो । जिससे सबका कल्याण हो वही करना चाहिए । मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान सफल होगी ।’ यह कहकर भगवान शंकर और पार्वतीजी अन्तर्ध्यान हो गए ।
श्रीरामचरितमानस की रचना का आरम्भ
तुलसीदासजी अपने सौभाग्य की प्रशंसा करते हुए अयोध्या में आकर रहने लगे । वे केवल एक बार दूध पीकर रहते थे । संवत् १६३१, चैत्र शुक्ल रामनवमी के दिन वही योग बने जो त्रेतायुग में रामजन्म के दिन थे । प्रात:काल हनुमानजी ने प्रकट होकर तुलसीदासजी का अभिषेक किया । भगवान शंकर, पार्वती, गणेशजी, सरस्वतीजी, नारदजी और शेषजी ने तुलसीदासजी को आशीर्वाद दिया । सबकी कृपा और आज्ञा प्राप्त करके तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस की रचना शुरु की । दो वर्ष, सात महीने, छब्बीस दिन—संवत् १६३३ में मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में श्रीरामविवाह के दिन श्रीरामचरितमानस की रचना पूरी हुई । इस ग्रन्थ में बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के रूप में सात काण्ड हैं । ‘गागर में सागर’ की तरह इन सातों काण्डों में श्रीराम के चरित्र का वर्णन है ।
इस दिव्य ग्रन्थ की समाप्ति मंगलवार के दिन हुई । तब हनुमानजी पुन: प्रकट हुए और पूरी रामायण सुनी और गोस्वामीजी को आशीर्वाद दिया कि यह कृति तुम्हारी कीर्ति को अमर कर देगी ।