घर भर जाता है जब दोनो बच्चे घर पर हो ,एक अकेले को तो डाँट कर एक कोने में बैठाकर पढ़ने को कहा जा सकता ।लेकिन जब दोनों भाई एक साथ हो जाते तो हँसी ठहाके किस्सागोई ओर रसोई में पकते खाने की खूशबू कितना प्यारा मंजर होता है ।छह माह बाद बड़ा बेटा घर लौट आया है तो छोटे की खुशी का प्याला भी लबालब भरा है । इन दोनों भाइयो का प्यार देख अपने भाई बहन भी याद आते ।जब हम मायके जाते थे तो कैसे रात भर जागकर किस्से सुने सुनाए जाते थे। कैसे फलानी मासी बुआ चाची मामी की बातें बतकही का सामान होती थी ।देर रात गए भूख लगने पर हलवा या पराँठे बनाये जाते ।सुबह पाँच बजे जब मम्मी पापा जागते तो हम उनको चाय देकर सोने जाते थे । एक ही पलंग पर आड़े तिरछे से बैठे हम कितने स्नेह से रहते थे ।तब उसी शहर रहते कई कजिन भाई बहन भी इस महफ़िल में शामिल हो जाते थे ।रतजगे की वोअपनी अलग सी रौनक होते थे । आज बेटो को देखकर वही खुशी महसूस कर रही हूँ । उनके पापा तो खामोशी से बलिहारी है बेटो को हँसी देख । चश्मेबद्दूर। एक बिटिया(बहू खोज रही आजकल) भी होती घर मे तो रौनक ओर ज्यादा हो जाती । इंशाल्लाह वो दिन भी आएगा जल्दी :-)
धूप सर्दी और अपने अपनो के साथ घर का खाना हम देहरादून वालो का प्रिय शगल होता है ।