शब्दों के बीच खड़ा
तुम्हारी दृष्टि में पड़ा,
मुस्कानों में अड़ा
फूलों सा खिला हूँ।
तम से कटा
समय से सटा,
असत्य से हटा
तुमसे जुड़ा हूँ।
नीति को पकड़ा
टूटन को जोड़ा,
विवशता में फूटा
तुम्हें कचोटा हूँ।
माँग पर बैठा
ब्रम्हांड को देखा,
चहुँ ओर दौड़ा
अनन्तता में विलीन हूँ।
लिखा हुआ पढ़ा
कुछ उसमें जोड़ा,
सौन्दर्य भाव में गढ़ा
फिर भी अव्यक्त हूँ।
* महेश रौतेला