जब भारत चला था
अकेला था,
न पूरब में कोई था
न पश्चिम में कोई था,
अपना नाम था
अपनी भाषा थी
सब स्वयं ही खोजा था।
तब राहों की तड़क-भड़क
मन के महल
संस्कृति के अध्याय
सभ्यता के पृष्ठ
नदियों के तीर्थ
धरती और समुद्र के पावन स्थल
भारत ने बनाये थे।
दी थी पवित्रता
पेड़-पौधों को,
बैठा दिया था
देवी-देवताओं को
धरा के कण-कण में।
"बसुधैव कुटुम्बकम" से चल
फिर क्या हुआ कि
वह गजबजाने लगा
अपनी ही खोज में
अपने ही अध्यात्म में
अपने ही बोलों में।
अपनी ही भाषा
अत्याड़ सी,अड़चन सी
लगने लगी उसे,
और उसको उठने को बोला
इतिहास ने बार-बार।
*** महेश रौतेला