नग़मा-ओ-शेर की सौगात
किसे पेश करूँ
ये छलकते हुए जज़बात
किसे पेश करूँ
शोख़ आँखों के उजालों को
लुटाऊं किस पर
मस्त ज़ुल्फ़ों की सियह रात
किसे पेश करूँ
गर्म सांसों में छिपे राज़
बताऊँ किसको
नर्म होठों में दबी बात
किसे पेश करूँ
कोइ हमराज़ तो पाऊँ
कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारत
किसे पेश करूँ
इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात
किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात
किसे पेश करूँ
हुस्न और हुस्न का हर नाज़
है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात
किसे पेश करूँ
तेरी आवाज़ के जादू ने
जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात
किसे पेश करूँ
ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल,
ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात
किसे पेश करूँ
कोई हमराज़ तो पाऊँ
कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात
किसे पेश करूँ
- साहिर लुधियानवी