ठहरा पानी क्यों कोई ठहरे पानी में कंकर फेंक रहा है? पानी की हिलोरों में कुछ धूमिल छवियाँ उभार रहा है। जाने कैसे अहसासों की नैया डोलने लगी है। मन के अनछुए तारों की झंकार भी अब सुनने लगीहै। दिल के किसी रीते कोने से सीत्कार सी उठने लगी है। कोई दस्तक दे रहा है , धड़कनें बढ़ने लगी हैं। नहीं, "तुम चले जाओ अजनबी " कि आज मेरी भावनाओं का बाँध भरभरा न जाए। मर्यादाओं के पुल कहीं ध्वस्त न हो जाए। संस्कारों की चुनर कहीं मैली न हो जाए। नहीं ,"तुम छूना ना मुझे " मैं फिर से बिखर न जाऊँ। नहीं , मैं तुम्हें नही दे सकती,अब वो समर्पण दे नहीं सकती । मैं जानती हूँ तुम आडो़लित कर चले जाओगे । कामनाओं की नदी में तूफा़न उठाकर छोड़ जाओगे । फिर मैं अपने साथ अकेली रह जाऊँगी । इस पिंजर में अब क्या उम्मीद बाकि रही है, जो तुम चाहते हो इसे आबाद करना। बस अब और कंकर न मारना । पानी को नीरव रहने दो। पानी को ठहरा रहने दो। पानी को ठहरा रहने दो।