शीर्षक: अस्तित्व का सच
बहुत खूब, तुम्हारी आँखे लगती है
जब उनमें, मुस्कराहटे झलकती है
सच है, दर्पण दिल का, आँखे ही होती है
गलत सोच की बूंदे, दर्पण को धुन्दला देती है
जिस्म कुछ नहीं, चलती फिरती दीवार है
समझलों, इसकी ऊर्जा अंदर का प्यार है
दीवार में बालू, सीमेंट और कंकर की भरमार है
वैसे ही जिस्म में, मांस, मज्जा, हड्डियां बेशुमार है
हस्र भी वही है, हर दीवार एक दिन गिरती है
हाँ, नींव अमर है, अस्तित्वहीन होकर भी रहती है
हाल जिस्म का भी यही होता, अंत उसका होता है
आत्मा उसकी अमर, कर्म से फिर कहीं जन्म होता है
जीवन भी एक दीवार समझ कर जीना सही है
गलत न समझना, अगर बात "कमल" ने कही है
✍️कमल भंसाली
-Kamal Bhansali