" हर श्वास पे "
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कब तक खाता रहु कसम ;
कुछ तो छोड़ो विश्वास पे ।
मै बेकरार हूं मिलने मौत से ;
पर जान अटकी है हर श्वास पे ।
फिर भड़ास निकाली उसने ;
ओर पत्थर फेंका लाश पे ।
तू कर लेगा गर रोशनी तो ;
कौन करेगा भरोसा अमास पे ।
सहरा में भी वो प्यासा न मरता ;
क्यों खाई तरस तूने " Bन्दास " पे ।
✍️ " Bन्दास "
राकेश वी सोलंकी ।