चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएँ
न तुम याद आओ न हम याद आएँ
......सरदार अंजुम
ज़िंदगी गुम न दोस्ती गुम है
ये हक़ीक़त है आदमी गुम है
केवल डिबाइबी
लिखने को लिख रहे हैं ग़ज़ब की कहानियाँ
लिक्खी न जा सकी मगर अपनी ही दास्ताँ
इब्न-ए-सफ़ी
लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं
इक बुराई है तो बस ये है कि मर जाते हैं
.......रउस फ़रोग़
लोग नफ़रत की फ़ज़ाओं में भी जी लेते हैं
हम मोहब्बत की हवा से भी डरा करते हैं
..... लता हया
रेखता के सौजन्य से 🙏