**खुद के स्वार्थ के लिए**
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( मुक्तछंद काव्य रचना )
सिर्फ उन्नति है यहां वो किस काम की,
जहां होती नहीं देखभाल उस कुदरत की।
मत भूलो कुदरत के बिना नहीं कोई भी जिंदगी,
कुदरत से ही मिलती है खुशियां हमें जीने की।
धुप के बिना यहां बारिश कैसे हो जायेगी,
प्राणवायु के बिना जिंदगियां कैसे जी पायेगी?
सरेआम पेडो को गर मिटाते जाओगे तुम,
तो तपती धुप में छांव कहां से मिल पायेगी।
इस सृष्टि में है कितने सारे जीव-जंतु,
हर किसी का जीवन उसी कुदरत से जुड़ा है।
कुदरत से ही मिलता है फूल,फल और अनाज सबको,
कुदरत के बिना जीवन सबका यहां अधुरा है।
पेड़ लगाओ,पेड़ जगाओ यही है जरूरत कल की,
जन मन में फैलाकर यही संदेश सृष्टि को बचाना होगा।
अगर कुदरत को ही तुम मिटाओगे तो ,
एक दिन कल का सुरज भी देखना नशीब नहीं होगा।
इधर उधर ढुंढने से कुछ हासिल नहीं होगा तुम्हें,
ये धरती ही हमारी अनमोल जिंदगी है ।
उसी धरती को ही बचाकर हम सबको यहां,
कल की आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल करना है।
खुद के स्वार्थ के लिए इतना भी मत बदलो तुम,
सृष्टि ही हमारे जीवन की अनमोल खुशियां है।
ये सृष्टि ही है हमारा आनेवाला सुनहरा कल,
किसी भी सृष्टि का निर्माण इन्सानों के बस की बात नहीं है।
मिलिंद क.महा.लातूर.
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