कुछ ज्यादा चाहत लफ्जो में बढाके रखो
कुछ ज्यादा दर-ओ-दिवार सजाके रखो
खातिरदारी की नुमाइश से बचकर रहना
किताबों के बाहर ख़ुदा को बचाके रखो
हर चाहत कि मिनार ताजमहल नहीं होती
समय की छैनी से उसे रोज तरास के रखो
समझ ना ले कोई मुर्दा बाशिंदा , महेफिल में
इसलिए कम-से-कम आगाज बचाकर रखो
आसमो से गिरना गर तय है , फिर भी
कुछ हवा भी अपने पंखों में दबाकर रखो