एक छंद मुक्त रचना
ना सोचा मानव कितना अत्याचार किया,
बिना कारण चिड़ियों का घर उजाड़ दिया।
हरे भरे वृक्ष काट कारखाने खूब लगाए,
काट काट जंगल होटल और महल बनाये,
विकास नाम पर तरंगों का जाल घनेरा बुना,
चीत्कार जीव जंतुओं की किया अनसुना,
विकास के दर्प में बना रहा तू बिल्कुल अंधा,
हर पल हर क्षण तूने किया है केवल धंधा,
पर्यावरण संतुलन को तूने ही है मिटाया,
ग्लोबल वार्मिंग को लगातार हैं बढ़ाया,
आज प्रकृति का अति उजाड़ अखर रहा है,
बिन ऑक्सीजन के देखो मानव है मर रहा।
अभी भी समय है भावी संतति को बचा लो,
बची जो भूमि है थोड़ी सी उस पर पेड़ लगा लो।
ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम