सबर रखना हर किसी का काम नहीं है,
सबर को छोड़ देना भी आसान नहीं है।
ध्यान रखना ! आलसी ना बन जाना ।
ध्यान रखना ! समझ को खो न देना।
पानी प्यासे के पास कभी नहीं जाता।
हिरन शेर के मुंह में खुद से नहीं जाता !
मंजिले किसी प्रिय स्त्री की भांति है,
दिखती है, इंतज़ार करती है,
पुकारती है, संकेत भी देती है,
प्रयास करने को उकसाती भी है,
अत्यंत सरल होने पर भी वो,
एक कदम तक नहीं बढ़ाती है।
ज्यादा इससे और क्या खयाल रखना,
मंजिल मिल चुकी है खयाल रखना ।
मंजिल के पीछे बस लगे न रहना,
कभी उसके आगे भी बढ़ जाना है।
- आचार्य जिज्ञासु चौहान