हे शिव शंभु उमापति शंभु
हिमालय निवासी डमरू धारी
गले में शोभे सर्प की माला
माथे बिराजे है चंद्र निराला
अंग पर सोहे चर्म का वाघा
न्यारी है रुद्राक्ष की शोभा
जिसके ललाट पर है ज्योति
हे त्रिपुरारी,सोहे नंदी की सवारी
शिव ही वेद है, वेद ही शिव है
शिव से ही सब, सब में शिव है
हे देवो के देव महादेव
हे शिव शंकर, हर हर भोले
हे शिव शंकर, हर हर गंगे
लेखन - कृपा ठक्कर