अखंड भूमंडलाचार्य जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्यजी एवम् श्रीवल्लभ नंदन श्रीगुसांईजी परमदयाल के युग्म चरणोमें सदैन्य दंडवत् प़णाम
नैनन में पिचकारी दई,
मोहे गारी दई
खेली न जाय होरी खेली न
जाय होरी खेली न जाय।
क्यों रे लंगर लंगराई मोसे कीनी,
केसर कीच कपोलन दीनी लिये
दिये गुलाल यों तो ठाडो मुसकाय,
होरी खेली न जाय खेली न जाय॥१॥
नेक न कान करत काहू की,
नजर बचावे भैया बलदाऊ
की पनघट सो घर लों बतराय,
होरी खेली ने जाय ॥२॥
ओचक कुचन कुमकुमा
मारे, रंग सुरंग सीस पे डारे
यह ऊधम सुन सास रिसाय.
मेरि सास रिसाय.
होरी खेली न जाय॥३॥
होरी के दिनन मोते दूनो दूनो अटके,
"सालीगराम" कौन जाय हटके
अंग चुपट हँसी हा हा खाय..
हंसी हा हा खाय,
होरी खेली न जाय ॥४॥
परम भाग्यवान आत्मप्रिय सर्वे वल्लभी वैष्णवोने सदैन्य सहस्नेह भगवदस्मरण
ll जय श्रीकृष्ण ll. #दिपकचिटणीस (DMC)✍🏻✍🏻✍🏻