माफी का दौर तो चल नही रहा अब दिल ए दुनिया के दायरे में,
शिकायते मेरी बढ़ती रही उसको दूर बैठे निहारने के नए अलफाज में,
क्या क्या नही चुभ रहा यहां हर वक्त उसके दिल को चोट पहुंचाने में,
में इस कदर टूटा हुवा हूं की तेरे साथ जी कर भी मरजाने के दावे में,
तू पास आ थोड़ी देर गुस्ताखी महोबबत को थोड़ी देर रुला देने में,
हो सके तो मेरी और चलकर देख नजारा हर सांस भी फुल जाने में,
में नहीं देख सकता तुझे दूर नजदीक बैठा रखू एक आशियाने में,
में बुरा ही सही पर तुझे कही जज्बात ए कायम रख कर आसमा बना ने में,
एक बार आ और देख मेरे हिस्से की चोट हर कदम डरती कैसे है चलने में,
मरता जा रहा हु कही तुझे मेरे सीने में ढूढने के दिल टूट कर संभालने में।
🙏😔