हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार तुमसे मिलके बिछड़ता रहा हूँ मै
तुम कौन हो ये जानती नही हो तुम
में कौन हुं ये खुद भी नही जानता नही हु में
तुम मुझको जानकर ही पड़ी हो अज़ाब में
और इस तरह खुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मै
तुम जिस ज़मीन पर हो में उसका खुदा नही
बस सरबसर अज़ीयत ओ आज़ार ही रहो
बेज़ार हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम
बेज़ार हो गई हो तो बेज़ार ही रहो
में इफ़्तदाये इश्क़ से बेमेहर ही रहा
तुम इन्तेहाये इश्क़ का मैयार ही रहो
तुम खून थूकती हो ये सुनकर ख़ुशी हुई
इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो
मेने ये कब कहा था मुहब्बत में है नजात
'मेने ये कब कहा था कि वफादार ही रहो
जब में तुम्हे नशात ए मुहब्बत न दे सका
गम में कभी सुकुन ए रफाकत न दे सका
जब मेरे सब चराग़ ए तमन्ना हवा के है
जब मेरे सारे ख्वाब एक बेवफ़ा के है
फिर मुझको चाहने का तुम्हे कोई हक़ नही
तन्हा कराने का तुम्हे कोई हक नही
John Elia ki Shayri ..