क्षणभर तेरी याद आयी तो
ऐसा लगा सब तीर्थ हो गये,
जिस पथ पर मेरा आना था
उस पथ पर नूतन फूल खिल गये।
ऐसा लगा सब धूल झड़ गयी
ऊँचे पर्वत पर जैसे धूप आ गयी,
गंगा सा पावन बहाव मिला
जब क्षणभर तेरी याद आ गयी।
यह मातृभूमि थी पता मुझे था
उसके आँगन में खड़ा हुआ था,
बीते युग की आहट लिये वे
महाकाव्य आ गये तो प्रकाश हुआ था।
क्षणभर मानव पिचाश हुआ था
ऐसा यादों में कभी आया था,
वर्षों मानव महान हुआ था
ऐसा स्मृति में पड़ा हुआ था।
क्षणभर ऐसी याद आयी कि
जैसे बैठे-बैठे धूप आ गयी,
मन से कोहरा हटा हुआ था
कहूँ, लम्बी बात निकट आ गयी।
* महेश रौतेला