देश दिशान्तर मैं फिरूं, मानुष बड़ा सुकाल।
जा देखे सुख उपजे, वाका पड़ा दुकाल।।2।।
मैं देश-देशांतरों में बहुत भ्रमण कर चुका हूं और मैंने देखा है कि संसार में मनुष्य तो बहुत अधिक हैं, परंतु जिन्हें देखकर हृदय में सुख और शांति उत्पन्न हो, ऐसे मनुष्यों की बहुत ही कमी है। वह सहज ही देखने को नहीं मिलते।
सत साहेब जी ,,,
🙏🙏🧎🏻🧎🏻🙏🙏